“मैं जिन्दा हूँ तभी कहता हूँ”!!

 

  

 मुर्दों में नहीं रहता हूँ,

           भावनाओं में नहीं बहता हूँ।

   बस परम्पराओं को सहता हूँ।।

        मैं जिन्दा हूँ तभी कहता हूँ……….


भाषाओँ ने हमें रोका,

      मजहबों ने हमें टोका,

अब तो बैठकर चौखट पर घर की,

        सिसकियाँ लेता हूँ।

कोई रोता है तो रोता हूँ,

      कोई हँसता है तो हँसता हूँ।

मैं जिन्दा हूँ तभी कहता हूँ……..


घमंड नहीं रखता हूँ,

       प्रेम को ही पालता हूँ।

इच्छाएं बड़ी हैं,

      विडम्बनाओं से ही हारता हूँ।

 मैं ही ये सोचता हूँ?

        मैं ही ये देखता हूँ???????


       क्यों????…आखिर क्यों?????

क्योंकि मैं ही जिन्दा हूँ….!!!!!

    मैं ही जिन्दा हूँ तभी तो कहता हूँ….!!!

      

              

            ~~”कुमार रंजीत”~~!!®!!…

“यकीं है तुझको मेरी यादें भी आयी होंगी”…!!

​तुमने फिर से किताबें वो अपनी उठाई होंगी,

यकीं है तुझको मेरी यादें भी आयी होंगी।

तूने पलकें जो नमी में यूं डुबोयी होंगी,

यकीं हैे तन्हाई में जी भर के ये रोयी होंगी।

मैं था भटका जो यूँ प्यार तुझसे करता था,

गुजरे लम्हों की कोई माला यूँ पिरोई होंगी।

मैं जो चाहूँ करूँ नफरत तो भी न कर पाऊँ,

तूने रिश्तों की कोई क्यारी तो बनाई होंगी।

यकीं है तुझको मेरी यादें भी आयी होंगी….!!

आज मौसम भी बड़े शौक से बर्षा देखो,

तूने जुल्फें तेरी बरसात में भिगोई होंगी।

खुश हूँ कि दूर है तू मुझसे ये मेरा दिल बोले,

पास भी आयी कसम तुझसे न मोहब्बत होगी।

यकीं है तुझको मेरी यादें भी आयी होंगी….!!


तुमने फिर से किताबें वो अपनी उठाई होंगी,

यकीं है तुझको मेरी यादें भी आयी होंगी…!!


          “~~कुमार रंजीत~~”!!®!!.                

            (8726240991)..

“~~Our Extra-Dimensional Minds~~”..



​The local region of the omniverse consists of a large-scale four-dimensional open universe superimposed over a small-scale seven-dimensional closed multiverse. This means that although the brain is only three-dimensional wetware operating through time, the mind can actually function in as many as eleven different dimensions simultaneously. In this way, the degrees of freedom of the latter far surpass that of the former, allowing for the emergence of consciousness within the confines of a skull.


      As part of this, when an animal experiences a mental state, interactions within different brain regions create complex patterns, producing networks with constantly changing structures. So, each active neuron connects to every other in a very specific way, to form a precise configuration, such that the more neurons in the network the more dimensions that can be accessed. This allows for tremendous amounts of information to be processed very rapidly, and also accounts for some of the more mysterious aspects of metaphysical systems.


          In generating and receiving thoughts and feelings in this way, part of what the brain does takes place in the quantum realm, orders of magnitude below the size of neurons. This is important because the compactified regions where this occurs are so far down in scale that they are not just really small, they actually lead into hidden places where objects can’t go. This extra-dimensional space is what enables qualia to form into big ideas.

“छू लेने दो नाजुक होंठो को”..!!

​छू लेने दो नाजुक होठों को,

     कुछ और नहीं है जाम है ये

कुदरत ने जो हमको बख्शा है

    वो सबसे हँसी ईनाम है ये


शरमा के न यूँ ही खो देना

        रंगीन जवानी की घड़ियां

  बेताब धड़कने सीनों की

     अरमान भरा पैगाम है ये,

छू लेने दो नाजुक होंठो को………..


अच्छों को बुरा साबित करना

     दुनिया की पुरानी आदत है

इस मय को मुबारक चीज समझ

     माना कि बहुत बदनाम है ये

छू लेने दो नाजुक होंठो को 

    कुछ और नहीं है जाम है ये

          छू लेने दो नाजुक होंठो को…….. 

                                       “~~साहिर~~”..

                ‘        “~~कुमार रंजीत~~”…!!

“तिनका-तिनका घर”!!..

​तन्हा बैठा था एक दिन मैं अपने मकान में,

चिड़िया बना रही थी घोंसला रोशनदान में।

पल भर में आती पल भर में जाती थी वो,

छोटे-छोटे तिनके चोंच में भर लाती थी वो।

बना रही थी वो अपना घर एक न्यारा,

कोई तिनका था-ईंट, उसकी कोई गारा।

कड़ी मेहनत से घर जब उसका बन गया,

आए खुशी के आंसू और सीन तन गया।

कुछ दिन बाद मौसम बदला और हवा के झोंके आने लगे,

नन्हे से प्यारे प्यारे दो बच्चे घोंसलें में चहचहाने लगे।

पाल-पोसकर कर रही थी चिड़िया बड़ा उन्हें,

पंख निकल रहे थे दोनों के, पैरों पर करती थी खड़ा उन्हें।

देखता था मैं हर रोज उन्हें,जज्बात मेरे उनसे कुछ जुड़ गए, 

पंख निकलने पर दोनों बच्चे मां को छोड़ अकेले उड़ गए।

चिड़िया से पूछा मैंने, ‘ तेरे बच्चे तुझे अकेला क्यों छोड़ गए’,

तू तो थी माँ उनकी फिर ये रिश्ता क्यों तोड़ गए।

इंसान के बच्चे अपने माँ बाप का घर नहीं छोड़ते,

जब तक मिले, न हिस्सा, अपना रिस्ता नहीं तोड़ते।

चिड़िया बोलीं परिंदे और इंसान के बच्चे में यही तो फर्क है,

आज के इंसान का बच्चा मोह-माया के दरिया में गर्क है।

इंसान का बच्चा पैदा होते ही हर शै पर हक जताता है,

न मिलने पर वो माँ-बाप को कोर्ट कचहरी तक ले जाता है।

मैंने बच्चों को जन्म दिया पर करता कोई मुझे याद नहीं,

मेरे बच्चे क्यों रहेंगे साथ मेरे, मेरी कोई जायदाद नहीं।।

     मेरी कोई जायदाद नहीं……!!!

          “~~कुमार रंजीत~~”!!…

“तुम्हें ऐसे नहीं जाना था”!

इन आँखों में जो इक गम है, 

       ये आंखें उसी गम से नम हैं,

इन्हें तो अब खुशियों से मुस्कुराना था,

 आखिर तुम क्यों चले गए,तुम्हें ऐसे नहीं जाना था।

       तुम्हें ऐसे नहीं जाना था…….।।

अब तो आँशुओं ने भी रास्ता छोड़ दिया,

         क्यों तुमने दिलों का नाता तोड़ दिया,

क्या खता की हमने ये हमको बताना था,

  आखिर तुम क्यों चले गए, तुम्हें ऐसे नहीं जाना था।

       तुम्हें ऐसे नहीं जाना था……।।

अब तो हवा भी बावरी सी लगने लगी है,

    अब ये कोयल न जाने क्यों बहकाने लगी है,

ये समंदर भी उथला सा लगने लगा है,

     काली घटा सी ये रजनी लगने लगी है,

तुम्हें तो चांदनी रात में फूलों सा मुस्कुराना था,

   आखिर तुम क्यों चले गए,तुम्हे ऐसे नहीं जाना था।

       तुम्हें ऐसे नहीं जाना था…….।।

जैसे काली घटा तेरी जुल्फें लगें,

        तू जो हंस दे तो जैसे कि बंसी बजे,

हमें अकेला छोड़ कर क्यों चले गए,

       तुम्हें तो हमारा “कत्ल” करके जाना था,

आखिर तुम क्यों चले गए, तुम्हें ऐसे नहीं जाना था।

      तुम्हें ऐसे नहीं जाना था………।।।  

      


                       

                   “~कुमार रंजीत~”!!®!!..

“मुझे बदलने दे”..


“तेरी आँखों की मस्ती में रंग हजारों हैं,

इन रंगों को मुझ पर चढ़ने दे, 

मुझे भी इन रंगों के साथ बदलने दे,

      तेरी ये मुस्कान,

      इससे चाँद भी अपना मुँह छुपा ले,

तेरे लबों की लाली, जो चाँदनी को भी फीका बना दे,

 

मुझे तेरी उस चांदनी में खो जाने दे,

   मुझे तेरे रंग के साथ बदल जाने दे।

  मुझे थोड़ा और, थोड़ा और

       थोड़ा और

   आगे बढ़ जाने दे, 

      आगे बढ़ जाने दे।।।



     “~कुमार रंजीत~”!!®!!..

“थोड़ा हैरान है,थोड़ा परेशान है”..

थोड़ा हैरान है, थोड़ा परेशान है

ये बुद्धू सी जिंदगी अभी भी नादान है ।

कहती है यादों की उंगलीया पकड़ते हैं,

हम फिर से बचपन में चलते हैं,

वो…जो खिड़कियों से रोज़ आवाज लगाती हैं,

हाँ वही यादें …जो हमें रोज़ फुसलाती हैं।

मैं फिर से नंगे पांव निकल पड़ी थी,

उस हरी घास पर मैं उसके पीछे चल पड़ी थी,

उस सुबह एक हल्की सी धुंध दिखाई पड़ी थी,

शायद मैं बचपन में लौट चली थी ।

मिट्टी के घरौंदे बनाया करते थे,

हम काग़ज की नाव तैराया करते थे,

रेत पर अपने नाम छोड़ जाया करते थे,

आसमां के तारो से कहानिया बना के सो जाया करते थे,

दरवाजे की कुंडी खटकाया करते थे,

हम शरारते करके यूं ही भाग जाया करते थे,

एक गुड्डा भी था, एक गुड़िया भी थी,

ब्याह उनका भी कराया करते थे,

दादाजी के मूंछो की हम नकल उतारा करते थे,

मां की साड़ी पहन के हम भी दुल्हन बन जाया करते थे,

दो रोटी मां के हाथों की भी थी,

चंद निवाले ही सही… प्यार भरी तो थी ।

उधर भाईया की अलग ही कहानी होती थी,

वो आसमां में पतंग और बगल में इश्क लड़ाया करते थे,

पतंग की डोर तो उनके हाथों में होती थी,

पर नजर पड़ोस में किसी और पर ही होती थी,

हाँ हम उन्हे भी चिढाया करते थे,

रिश्वत में चंद सिक्को से खुश हो जाया करते थे ।

हाँ वो बचपन का छोटा सा संसार था,

पर उसकी एक लम्बी सी कहानी थी,

बेवजह खुशियां लुटाते थे,

हम बेवजह प्यार भी जताते थे,

चलो नादान ज़िंदगी को फिर से समझाते हैं,

इसे कल और आज में फर्क बताते हैं ।

मिट्टी के घरौंदे अब सपने हो गये हैं,

अब तो ईंट के मकान की नींव भी कमजोर होने लगे हैं,

तब काग़ज के नाव को भी सहारा दिया करते थे,

अब तो दूसरों की नाव को भी छेदने में लगे पड़े हैं ।

तब गुड्डे और गुड़ियों की बात कुछ और थी,

अब अपनी ही ज़िंदगी हर किसी के लिए खिलौना है,

जब तक मन में आया खेला…

वरना किसी और के आगे फेंक देना है।

दादाजी के मूंछो की नकल क्या उतारेंगे,

जब खुद से दूर वो वृध्दाश्रम में पड़े हैं,

पतंगो की डोर अब कभी दिखाई पड़ती नहीं,

अब तो रिश्तों की गांठ भी कभी सुलझती नहीं।

माँ की रोटी और भाई की रिश्वत अब कभी मिलती नहीं,

खुद के पैसों से अब रोटी कमाने में लगे पड़े हैं,

बेवजह की खुशियाँ क्या लुटायेंगे हम,

जब दुसरो की खुशी से ही जलने लगे हैं ।

ऐ जिंदगी… अब यही तेरा कड़वा सच है,

कल की यादों और आज में ये तेरा फर्क है ,

इतना बताने पर भी इसे बचपन में जाना है,

क्या करूं…बुद्धू सी ज़िंदगी अभी भी नादान है,

थोड़ा हैरान है… थोड़ा अभी भी परेशान है |



                          Written by: Anu upadhyay



         ~~कुमार रंजीत~~!!®!!….