“युगपुरुष ~अटल जी~”..

​आओ फिर से दिया जलाएँ -अटल बिहारी वाजपेयी
आओ फिर से दिया जलाएँ

 भरी दुपहरी में अंधियारा

 सूरज परछाई से हारा

 अंतरतम का नेह निचोड़ें-

बुझी हुई बाती सुलगाएँ।

 आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
 लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल

 वतर्मान के मोहजाल में-

आने वाला कल न भुलाएँ।

 आओ फिर से दिया जलाएँ।

 आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
 अपनों के विघ्नों ने घेरा

 अंतिम जय का वज़्र बनाने-

नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।

 आओ फिर से दिया जलाएँ।

क़दम मिला कर चलना होगा -अटल बिहारी वाजपेयी
बाधाएँ आती हैं आएँ
 घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते,

आग लगाकर जलना होगा।

 क़दम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा।

 क़दम मिलाकर चलना होगा।
उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा।

 क़दम मिलाकर चलना होगा।
सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढ़लना होगा।

 क़दम मिलाकर चलना होगा।
कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा।

 क़दम मिलाकर चलना होगा।

ऊँचाई -अटल बिहारी वाजपेयी
ऊँचे पहाड़ पर, 
पेड़ नहीं लगते, 

पौधे नहीं उगते, 

न घास ही जमती है। 

जमती है सिर्फ बर्फ, 
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, 

मौत की तरह ठंडी होती है। 

खेलती, खिलखिलाती नदी, 

जिसका रूप धारण कर, 

अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। 

 ऐसी ऊँचाई, 
जिसका परस 

 पानी को पत्थर कर दे, 

ऐसी ऊँचाई 

 जिसका दरस हीन भाव भर दे, 

अभिनंदन की अधिकारी है, 

आरोहियों के लिये आमंत्रण है, 

उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं, 

किन्तु कोई गौरैया, 
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती, 

ना कोई थका-मांदा बटोही, 

उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है। 

 सच्चाई यह है कि 
 केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती, 

सबसे अलग-थलग, 

परिवेश से पृथक, 

अपनों से कटा-बँटा, 

शून्य में अकेला खड़ा होना, 

पहाड़ की महानता नहीं, 

मजबूरी है। 

 ऊँचाई और गहराई में 

 आकाश-पाताल की दूरी है। 

जो जितना ऊँचा, 
उतना एकाकी होता है, 

हर भार को स्वयं ढोता है, 

चेहरे पर मुस्कानें चिपका, 

मन ही मन रोता है। 

 ज़रूरी यह है कि 
 ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो, 

जिससे मनुष्य, 

ठूँठ सा खड़ा न रहे, 

औरों से घुले-मिले, 

किसी को साथ ले, 

किसी के संग चले। 

भीड़ में खो जाना, 
यादों में डूब जाना, 

स्वयं को भूल जाना, 

अस्तित्व को अर्थ, 

जीवन को सुगंध देता है। 

धरती को बौनों की नहीं, 
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है। 

 इतने ऊँचे कि आसमान छू लें, 

नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें, 

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं, 
कि पाँव तले दूब ही न जमे, 

कोई काँटा न चुभे, 

कोई कली न खिले। 

न वसंत हो, न पतझड़, 
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़, 

मात्र अकेलेपन का सन्नाटा। 

मेरे प्रभु! 
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, 

ग़ैरों को गले न लगा सकूँ, 

इतनी रुखाई कभी मत देना।

दो अनुभूतियाँ -अटल बिहारी वाजपेयी 
पहली अनुभूति:

गीत नहीं गाता हूँ
 बेनक़ाब चेहरे हैं,

दाग़ बड़े गहरे हैं 

 टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ

 गीत नहीं गाता हूँ

 लगी कुछ ऐसी नज़र

 बिखरा शीशे सा शहर
 अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ

 गीत नहीं गाता हूँ
 पीठ मे छुरी सा चांद

 राहू गया रेखा फांद

 मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ

 गीत नहीं गाता हूँ
 दूसरी अनुभूति:

गीत नया गाता हूँ
 टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर

 पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर

 झरे सब पीले पात

 कोयल की कुहुक रात
 प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ

 गीत नया गाता हूँ
 टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी

 अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी

 हार नहीं मानूँगा,

रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ

 गीत नया गाता हूँ।

     By~~”Kumar Ranjeet”~~!!®!!..

Are you happy??

  1. Tell me are you happy?                       
  2. Tell me why are you happy?
  3. Tell me what is the reason that you are happy?
  4. Tell me, if you are happy.then why other are not happy?
  5. What have you got that is the reason of your happiness?
  • Your mother asking to you that come and sit with me for some times, you say: you are too busy that you cannot sit with him, but you are happy. But is your mother happy??


  • Your father said that he want to go to walk with you ,and you said that you have no time to walk with them go with your servent why because you are so busy, you are happy. But is your father happy??
  • You got tired by done some work, and don’t want to leastion anyone and being erritate, why ? Because you are so busy in your work, But what about that  solders who fighting for us morning to till night.???
  • You have your family and your family is all about for for you, there is nothing instead of your family, and you are so busy with your family, why?? What about those family’s who need some help form those person’s who can do anything else for their families livelihood? Why you can’t do anything for them? Is it’s not your responsibility that help some needy person’s who directly or indirectly are depended upon you,why you can’t? Because you are so busy, you have no time for them?? Help them and be a real person.
  • You have a lot of money, luxury, banglo,etc. But are you really happy??
  • It’s science rule that there are everything is reversible, you will got that, that you do. Now it’s depending upon you that what you want to get and what you do??
  • If you want to be happy then give something happiness to others , believe me you will get a lot of happiness .
  • Ask your self that as you are doing is right or wrong? You will get you answer.
  • Don’t do anything as like as you don’t want to be with you, believe me you will not do anything wrong with others.
  • These are some aspects that if you are following them, then you are happy and if you are not following them, then you are not.
  • Give happiness to others and be a real happy person of the world….

       By~~~”Kumar Ranjeet”!!®!!.~~~

“Best Collection of Hullana’s poems”

​दोहे / हुल्लड़ मुरादाबादी



कर्ज़ा देता मित्र को, वह मूर्ख कहलाए,

महामूर्ख वह यार है, जो पैसे लौटाए।


बिना जुर्म के पिटेगा, समझाया था तोय,

पंगा लेकर पुलिस से, साबित बचा न कोय।


गुरु पुलिस दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,

तभी पुलिस ने गुरु के, पांव दिए तुड़वाय।


पूर्ण सफलता के लिए, दो चीज़ें रखो याद,

मंत्री की चमचागिरी, पुलिस का आशीर्वाद।


नेता को कहता गधा, शरम न तुझको आए,

कहीं गधा इस बात का, बुरा मान न जाए।


बूढ़ा बोला, वीर रस, मुझसे पढ़ा न जाए,

कहीं दांत का सैट ही, नीचे न गिर जाए।


हुल्लड़ खैनी खाइए, इससे खांसी होय,

फिर उस घर में रात को, चोर घुसे न कोय।


हुल्लड़ काले रंग पर, रंग चढ़े न कोय,

लक्स लगाकर कांबली, तेंदुलकर न होय।


बुरे समय को देखकर, गंजे तू क्यों रोय,

किसी भी हालत में तेरा, बाल न बांका होय।


दोहों को स्वीकारिये, या दीजे ठुकराय,

जैसे मुझसे बन पड़े, मैंने दिए बनाय।

 क्या बताएँ आपसे / हुल्लड़ मुरादाबादी


क्या बताएँ आपसे हम हाथ मलते रह गए

गीत सूखे पर लिखे थे, बाढ़ में सब बह गए


भूख, महगाई, गरीबी इश्क मुझसे कर रहीं थीं

एक होती तो निभाता, तीनों मुझपर मर रही थीं

मच्छर, खटमल और चूहे घर मेरे मेहमान थे

मैं भी भूखा और भूखे ये मेरे भगवान् थे

रात को कुछ चोर आए, सोचकर चकरा गए

हर तरफ़ चूहे ही चूहे, देखकर घबरा गए

कुछ नहीं जब मिल सका तो भाव में बहने लगे

और चूहों की तरह ही दुम दबा भगने लगे

हमने तब लाईट जलाई, डायरी ले पिल पड़े

चार कविता, पाँच मुक्तक, गीत दस हमने पढे

चोर क्या करते बेचारे उनको भी सुनने पड़े


रो रहे थे चोर सारे, भाव में बहने लगे

एक सौ का नोट देकर इस तरह कहने लगे

कवि है तू करुण-रस का, हम जो पहले जान जाते

सच बतायें दुम दबाकर दूर से ही भाग जाते

अतिथि को कविता सुनाना, ये भयंकर पाप है

हम तो केवल चोर हैं, तू डाकुओं का बाप है


साल आया है नया / हुल्लड़ मुरादाबादी


यार तू दाढ़ी बढ़ा ले, साल आया है नया

नाई के पैसे बचा ले, साल आया है नया


तेल कंघा पाउडर के खर्च कम हो जाएँगे

आज ही सर को घुटा ले, साल आया है नया


चाहता है हसीनों से तू अगर नजदीकियाँ

चाट का ठेला लगा ले, साल आया है नया


जो पुरानी चप्पलें हैं उन्हें मंदिरों पर छोड़ कर

कुछ नए जूते उठा ले, साल आया है नया


मैं अठन्नी दे रहा था तो भिखारी ने कहा

तू यहीं चादर बिछा ले, साल आया है नया


दो महीने बर्फ़ गिरने के बहाने चल गए

आज तो हुल्लड़ नहा ले, साल आया है नया


भूल जा शिकवे, शिकायत, ज़ख्म पिछले साल के

साथ मेरे मुस्कुरा ले, साल आया है नया


दौड़ में यश और धन की जब पसीना आए तो

‘सब्र’ साबुन से नहा ले, साल आया है नया


मौत से तेरी मिलेगी, फैमिली को फ़ायदा

आज ही बीमा करा ले, साल आया है नया



         “कुमार रंजीत”!!®!!..

“जीवन के स्कूल में महीने भर की छुट्टी नहीं मिलती”..

1. जीवन उतार-चढ़ाव से भरा है, इसकी आदत बना लो।

2. लोग तुम्हारे स्वाभिमान की परवाह नहीं करते , इसलिए पहले खुद को साबित करके दिखाओ।

3. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद पांच आंकड़े वाली पगार की मत सोचो, एक रात में कोई वाइस प्रेसिडेंट नहीं बनता इसके लिए अपार मेहनत करनी पड़ती है।

4. अभी आपको अपने शिक्षक सख्त और डरवाने लगते होंगे, क्योंकि अभी तक आपका बॉस नामक प्राणी से पाला नहीं पड़ा।

5. तुम्हारी गलती सिर्फ तुम्हारी है, किसी को मत दोष दो।

6. तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे जन्म से पहले इतने नीरस और ऊबाऊ नहीं थे जितना तुम्हे अभी लग रहा है। तुम्हारा पालन-पोषण करने में उन्होंने इतना कष्ट उठाया कि उनका स्वभाव बदल गया।

7. कुछ स्कूलों में पास होने तक परीक्षा दी जा सकती है, लेकिन बाहर की दुनिया के नियम अलग है, वहां हारने वाले को मौका नहीं मिलता।

8. जीवन के स्कूल में महीने भर की छुट्टी नहीं मिलती। आपको सीखने के लिए कोई समय नहीं देता। यह सब आपको खुद करना होता है।

9. टीवी का जीवन सही नहीं होता और जीवन टीवी के सीरियल नहीं होते। सही जीवन में आराम नहीं होता, सिर्फ काम और सिर्फ काम होता है।

10. कड़ी मेहनत करने वाले अपने मित्रों को कभी मत चिढाओ । एक समय ऐसा आएगा कि तुम्हें उसके नीचे काम करना पड़ेगा।।।


             “कुमार रंजीत”!!®!!..

“भटकता मन”



क्यों न देखा कभी, 

                     क्यों न जाना कभी,

खातिर जिसकी तू भटका जहाँ में सदा,

साथ तेरे था, क्यों न पहचाना कभी।

ये हवायें भी तुझपे हैं हंसने लगीं,

मन की आंधी भी जोरों से चलने लगीं

क्यों तू भागा, न जागा समय पर अगर

भटकेगा रास्ता, भूलेगा तू डगर।

दर्द का बुलबुला तेरे आगोस से, 

       कब किधर जा गिरा,

               किस सागर में मिला,

बनके लहरें ग़मों की तेरे अश्रु भी,

 आज रोकें तुझे तू न जाना कभी,…2

बन के बैठी है पावों की बेड़ी तेरे,

 तेरा कंटक से पथ भी तुझे रोके खड़ा

तू न जाना कभी, तू न जाना कभी…2

 दर्द देता था जो चलने पर कभी,

आज फूलों से भी कोमल वो लगने लगा,

 दुख बड़ा है मगर, तू तो उससे बड़ा,

आज इंसां ही जाकर चंदा पर खड़ा,

एक अवसर मिला है उमर में तुझे

  देख शोला जो जलता कभी न बुझे।

तूने सोचा जो है उसे करता ही जा,

सुख मिले, दुख मिले आगे बढ़ता ही जा,

तू न रुकना कभी, तू न झुकना कभी….2

जैसा मांगा था तूने,जो चाहा था कभी

वो चमन भी मिलेगा, वो गगन भी मिलेगा,

वो काली भी खिलेगी, वो वतन भी मिलेगा।

बढ़ता जा तू अभी,लड़ता जा तू अभी,

  कहता जो मन तेरा, करता जा तू अभी, 

ये मंजिल तो इक छोटी सी बात है,

  तू जो चाहेगा तुझको मिलेगा कभी..

चलता जा तू अभी, बढ़ता जा तू अभी..2

         

        तू ही है खुदा, तू ही कारवां,

    तेरी आदत से ही तो तू है जवां,

खुद को पहचान ले,तू खुद को जान ले

देखेगा जमाना यूँ तुझको तभी,

    जानेगा जहाँ ये तुझको तभी।।

चलता जा तू अभी,बढ़ता जा तू अभी…..2


           “कुमार रंजीत”!!®!!….


Mo. 8726240991

जिंदगी के रंग…

ग़मों और खुशियों के हसीन मौसम में

चलती इस धीमी हवा संग बहता हूँ मैं,

पत्ते जैसे पेड़ों से झड़ते हैं पतझड़ में

कभी-कभी उनके जैसे ज़मीन पर गिरता हूँ मैं,

हैं कई बारिश की बूँदें भी टपकती सावन में

कुछ बूँदें इन पलकों के बादल में भरता हूँ मैं,

चिड़िया चहके जैसे ऊपर उस खिले-खिले आकाश में

अपने छोटे से जहाँ की वही चहक बनना चाहता हूँ मैं,

ये उलझे उलझे से ज़िन्दगी के तूफानों में

फूल की तरह खुद को संभालता हूँ मैं,

झूमती हुई हवाएं हैं जैसे हसीं वादीयों में

कुछ उनके जैसी अदाओं में लहलहाता हूँ मैं,

हैं पत्थर नदियों की तरह मेरी भी राहों में

उस नदिया जैसे पत्थरों के रूप में खुद को ढालता हूँ मैं,

कुछ मोती कुछ काँटों से सजे इस खूबसूरत समंदर में

लहरों के जोश की तरह उठती और थमता हूँ मैं,

कोई बादल प्यासा है तरस रहा आसमान में

उसमे अपने अश्क़ भरके उसे बरसने को कहता हूँ मैं,

हैं कुछ लोग जो फीके लगते हैं दुनिया में

उन्हें भी अपना साथी समझ कर आगे बढ़ता हूँ मैं,

सभी पलों को संजो कर रखना है ख्यालों में

तभी तो ज़िन्दगी के हर रंग को कलम से भरता हूँ मैं।

               “कुमार रंजीत”!!®!!

“औकात”

ना मैं किसी की समझता था ना कोई बात मेरी,

फिर जाकर एक दिन हुई आईने से मुलाकात मेरी.

.

मैं पूछता फिरता था के क्या हूँ मैं?

मेरे सामने हाज़िर थी औकात मेरी.

.

मैं सीना तान के फिरता था की मुझे क्या नहीं आता?

आईने ने बताया अभी दो-चार ही निकली हैं जमात मेरी.

.

अंदर वो शख्स अंजाना था और पहचाना सा भी,

ना मैं उसकी समझ पाया ना वो जात मेरी.

.

बस एक बात पूछी उसने और मैं बोल ना सका,

कितने पन्ने लिख लिए और भरी कितनी है दावात मेरी?



                   “कुमार रंजीत”!!®!!..

“क्यों”??!!..

जाने क्यूं_

_अब शर्म से,_

_चेहरे गुलाब नही होते.।_

_जाने क्यूं_

_अब मस्त मौला मिजाज नही होते._

_पहले बता दिया करते थे, दिल की बातें।_

_जाने क्यूं_

_अब चेहरे_,

_खुली किताब नही होते।_

_सुना है_

_बिन कहे_

_दिल की बात_

_समझ लेते थे।_

_गले लगते ही_

_दोस्त हालात_

_समझ लेते थे।_

_तब ना फेस बुक_

_ना स्मार्ट मोबाइल था_

_ना फेसबुक_

_ना ट्विटर अकाउंट था_

_एक चिट्टी से ही_

_दिलों के जज्बात_

_समझ लेते थे।_

_सोचता हूं_

_हम कहां से कहां आ गये,_

_प्रेक्टीकली सोचते सोचते_

_भावनाओं को खा गये।_

_अब भाई भाई से_

_समस्या का समाधान_

_कहां पूछता है_

_अब बेटा बाप से_

_उलझनों का निदान_

_कहां पूछता है_

_बेटी नही पूछती_

_मां से गृहस्थी के सलीके_

_अब कौन गुरु के_

_चरणों में बैठकर_

_ज्ञान की परिभाषा सीखे।_

_परियों की बातें_

_अब किसे भाती है_

_अपनो की याद_

_अब किसे रुलाती है_

_अब कौन_

_गरीब को सखा बताता है_

_अब कहां_

_कृष्ण सुदामा को गले लगाता है_

_जिन्दगी मे_

_हम प्रेक्टिकल हो गये है_

_मशीन बन गये है सब_

_इंसान जाने कहां खो गये है!_

_इंसान जाने कहां खो गये है….!_

.

“जाने क्यों”??..




 काम के बोझ तले, रोज़मर्रा की दौड़ में
वक्त यूँ ही निकल जाता है
पर अगर माँ से न हो दो पल बात, 
दोस्तोँ के साथ न हो कुछ देर मुलाकात,
तो दिन नहीं बन पाता है
दिमाग ही सोचता सिर्फ तो क्या था गम
जाने क्योँ दिल बीच में आ जाता है

कभी तो भीड़ में खोये, डरती हूँ 
पर स्थिर कदम नहीं डगमगाता है
फिर कभी यूँ ही अकेले में
पुरानी यादोँ के बीच एक आँसू छलक जाता है
दिमाग ही सोचता सिर्फ तो क्या था गम
जाने क्योँ दिल बीच में आ जाता है

कठिन राह पर, भरी धूप में 
पाँव के छालों का दर्द भी महसूस न हो पाता है 
और कभी तो हल्का सा हवा का झोँका ही
अन्दर तक हिला कर छोड़ जाता है
दिमाग ही सोचता सिर्फ तो क्या था गम
जाने क्योँ दिल बीच में आ जाता है

मंदिर की सीड़ी पर वो छोटे बच्चे
हाथ फैलाए, प्रसाद से पेट भरते किसी तरह
“मैं क्योँ सोचूं यह सब, मेरा क्या जाता है”
पर रोज़ वो निश्छल आँखें,
हर वो मासूम चहरा नज़र आता है
दिमाग ही सोचता सिर्फ तो क्या था गम
जाने क्योँ दिल बीच में आ जाता है




English Translation:

Don’t Know Why
——————–

Amid the load of work
Amid the tiring chores of the day
Time passes by just like that
But until I hear my mother’s voice
and just for a while, with friends, rejoice
The day can’t be serene
It’d have been good if just the brain did the thinking
Don’t know why the heart intervenes

Amid the crowd, sometimes I get lost and scared
but the firm step doesn’t waver
Amid old memories, yet sometimes,
nostalgia-ridden, I cry, I quaver
It’d have been good if just the brain did the thinking
Don’t know why the heart intervenes

On rough roads, under the scorching sun
Even the blisters on my feet don’t matter
A little, light wind wave, yet sometimes,
Dares to make the soul quiver
It’d have been good if just the brain did the thinking
Don’t know why the heart intervenes

Those poor little kids, at the temple steps
begging, deprived of bare necessities
“Why should I bother about this, it doesn’t affect my life”
But the image of those guileless eyes
and the innocent faces, daily can be seen
It’d have been good if just the brain did the thinking
Don’t know why the heart intervenes


Too bad a job with the English translation, I know. Sorry. “Bhawnaon ko samjho” (Understand the sentiment) 😉